इमाम ख़ुमैनी के निधन को तीस साल और इस्लामी क्रांति की सफलता को चालीस साल का समय बीत रहा है लेकिन इस्लामी क्रांति अब भी पिछली अर्धशताब्दी की सबसे अहम घटनाओं में से एक के रूप में बाक़ी है। इस्लामी क्रांति फ़रवरी सन 1979 में सफल हुई थी और उसे संसार की सबसे बड़ी जनक्रांतियों में से एक समझा जाता है। इस क्रांति में जनता के सभी वर्ग शामिल थे और राजशाही शासन व्यवस्था को उखाड़ फेंकने और जनता के मतो पर आधारित एक जनव्यस्था की स्थपना के लिए जनता की इतनी बड़ी संख्या की उपस्थित का एक कारण इमाम ख़ुमैनी का व्यक्तित्व था।
यही कारण है कि इस्लामी क्रांति की समीक्षा में लिखी गई अनेक किताबों में इस क्रांति की एक सफलता का एक मुख्य स्तंभ क्रांति के नेतृत्व को माना गया है। इस्लामी क्रांति के वर्तमान वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनेई इमाम ख़ुमैनी के व्यक्तित्व की विशेषताएं बयान करते हुए कहते हैं कि यह क्रांति दुनिया के किसी भी स्थान पर इमाम ख़ुमैनी के नाम के बिना पहचानी नहीं जाती। उनका व्यक्तित्व, बेजोड़ और हाथ न आने वाला था, उनका उच्च मानवीय स्थान ऐसा था जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती। वे ऐसे पहले थे कि जिसका दूसरा मिलना असंभव है।
संसार के राजनेताओं में शायद ही कोई नेता ऐसा हो जिसके व्यक्तित्व में इमाम ख़ुमैनी जैसी व्यापकता हो। वे एक ऐसी अद्वितीय हस्ती थे जिसने एक बिखरे हुए समूह को, एक एकजुट राष्ट्र बना दिया और शताब्दी की सबसे बड़ी क्रांति उत्पन्न करने में सफलता हासिल की। इमाम ख़ुमैनी के व्यक्तित्व की इसी व्यापकता के कारण करोड़ों लोगों ने उनका स्वागत किया और लाखों लोगों ने उनके मार्ग में अपनी जान और अपना माल न्योछावर किया। इमाम ख़ुमैनी के निधन पर दसियों लाख लोगों ने नम आंखों से उन्हें विदा कहा और कहा जाता है कि उनके अंतिम संस्कार में जितनी भीड़ थी उतनी किसी भी अन्य व्यक्ति के अंतिम संस्कार में नहीं पहुंची थी।
इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनेई कहते हैं कि इमाम ख़ुमैनी में वे सारी उत्तम व दुर्लभ विशेषताएं एकत्रित हो गई थीं जो शताब्दियों में भी शायद ही किसी महान व्यक्ति में एकत्रित होती हों। उन्होंने अपनी इन्हीं विशेषताओं के माध्यम से अपने काल के अत्याचारी शासकों की चूलें हिला दीं। इस्लामी क्रांति के अहम विचारकों में से एक शहीद मुर्तज़ा मुतह्हरी भी कहते हैं कि मैं उस व्यक्ति के बारे में क्या कहूं जिससे बात करते हुए मेरा पूरा अस्तित्व हिल जाता था। ऐसा बहुत कम होता है कि किसी राष्ट्र की सभी मांगें और उमंगें एक व्यक्ति के अस्तित्व में साक्षात हो जाएं।
इमाम ख़ुमैनी सूझ-बूझ रखने वाले एक महान धर्मगुरू थे। वे न केवल धार्मिक नियमों और शिक्षाओं के ज्ञानी थे बल्कि उनके रक्षक भी थे। धर्म को ग़लत विचारों और भ्रमों से दूर रखना हर धर्मगुरू का परम कर्तव्य होता है जैसा कि पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम का कथन है कि जब मेरे धर्म के अनुयाइयों के बीच ग़लत संस्कार उभरने लगें तो धर्म के ज्ञानियों का दायित्व है कि वे अपने ज्ञान को प्रकट करें और जो कोई ऐसा न करे उस पर ईश्वर की धिक्कार हो। पूरे इतिहास में, विभिन्न कारणों से धार्मिक विचार अपनी वास्तविक आयु खो कर परिवर्तित होते रहे हैं। कहा जा सकता है कि धार्मिक विचारों को, दो दिशाओं से सदैव ख़तरा रहा है।
प्रथम उन लोगों के विचारों व प्रयासों से जो धर्म तथा धार्मिक मान्यताओं व मूल्यों के संबंध में अपनी ग़लत व अपरिपूर्ण सोच को, धर्म की सच्ची, ठोस व परिपूर्ण शिक्षाओं के स्थान पर पेश करने का प्रयास करते हैं। ऐसे लोग ईश्वरीय धर्म और उसके उच्च मूल्यों को जड़ता व रूढ़िवाद में ग्रस्त कर देते हैं। इस प्रकार के विचारों को इस समय वहाबी और तकफ़ीरी सोच में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। धर्म के लिए ख़तरे की दूसरी दिशा, मायामोह और भौतिकता में ग्रस्त उन धर्म विरोधियों के आक्रमण है जो इस्लाम की उच्च मान्यताओं विशेष रूप से न्याय की स्थापना और अत्याचार के विरोध के संबंध में उसके आदेशों को अपनी वासनाओं, निरंकुशता, विस्तारवाद, ज़ोर-ज़बरदस्ती और वर्चस्ववाद के लिए ख़तरा समझते हैं। यही कारण है कि वे कभी तो धर्म को सामाजिक जीवन से पूरी तरह अलग करने की कोशिश करते हैं और कभी इस्लाम व उसकी मान्यताओं का बिगाड़ा हुआ रूप प्रस्तुत करने का प्रयास करते हैं जो उनकी अवैध इच्छाओं के अनुकूल हो।
इस प्रकार के विचारों के मुक़ाबले में सदैव ही ऐसे सच्चे व वीर धर्मावलम्बी रहे हैं जो इस्लाम व उसकी उच्च मान्यताओं की रक्षा और धार्मिक समाजों में सुधार के लिए उठ खड़े हुए और इस मार्ग में उन्होंने अथक प्रयास किए यहां तक कि कभी कभी इस प्रकार के पवित्र लक्ष्यों के लिए उन्होंने अपने प्राण भी न्योछावर किए। स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी भी ऐसे ही एक सच्चे संघर्षकर्ता व जागरूक धर्मगुरू थे जिन्होंने विचार और व्यवहार दोनों ही क्षेत्रों में उन सभी लोगों के समक्ष स्पष्ट मार्ग खोल दिया जो धर्म व धार्मिक मान्यताओं को पुनर्जीवित करने का संकल्प रखते हैं। वे ऐसे नेता थे जो धार्मिक शिक्षाओं के सहारे, अत्याचारी शासन को गिराने में सफल हुए और इस प्रकार उन्होंने धर्म व धार्मिक मान्यताओं पर पड़े हुए ग़लत विचारों व रूढ़िवाद के पर्दों को चीर दिया। ईरान की इस्लामी क्रांति, वर्तमान जगत में इस्लाम व उसकी मान्यताओं को पुनर्जीवित करने के मार्ग में इमाम ख़ुमैनी का सबसे प्रमुख व्यवहारिक क़दम है।
इस्लामी क्रांति ऐसे समय में व्यवहारिक हुई जब बहुत से टीकाकारों का मानना था कि बड़ी क्रांतियों का समय गुज़र चुका है और संसार ऐतिहासिक परिवर्तन के एक नए चरण में पहुंच चुका है। दूसरी ओर यह क्रांति जिस भूभाग में जिस कालखंड में आई वह उस समय के किसी भी मानदंड से मेल नहीं खाती थी। संसार एक भौगोलिक विभाजन के अंतर्गत पूर्वी व पश्चिमी ब्लॉकों में बंटा हुआ था। राष्ट्रों के भविष्य का निर्धारण पूरब व पश्चिम की दो बड़ी शक्तियों द्वारा ही किया जाता था। शायद यही वजह थी कि इस्लामी क्रांति को पूरे संसार में लोग इतने अधिक आश्चर्य से देख रहे थे क्योंकि उसकी प्रवृत्ति धार्मिक थी और उसके नारों में भी पैग़म्बरों की शिक्षाओं की बहाली की बात कही गई थी।
सत्तर और अस्सी के दशक में संसार का शायद ही कोई विचारक व राजनितिज्ञ होगा जिसने इस्लामी क्रांति की सफलता पर आश्चर्य प्रकट न किया हो। इस्लाम अर्थात क़ुरआन और पैग़म्बर व उनके परिजनों के चरित्र की विभन्न व्याख्याएं की जाती हैं। इमाम ख़ुमैनी इस्लाम की जो व्याख्या पेश करते हैं वह समय व स्थान जैसे दो मानकों पर आधारित है। इस्लामी शासन व्यवस्था की स्थापना के समय इस्लाम के बारे में इमाम ख़ुमैनी की व्याख्या की दो अहम विशेषताएं हैं, एक रुढ़िवाद से संघर्ष और दूसरे एक व्यापक राजनैतिक व प्रशासनिक आधार रखने वाले मत के रूप में इस्लाम का वर्णन। इमाम ख़ुमैनी ने इस्लाम की इन दोनों विशेषताओं को मिला कर एक अत्यंत मूल्यवान चीज़ पेश की जिसकी इस्लामी समाज को बहुत अधिक ज़रूरत थी, और वह चीज़ थी धर्म व राजनीति को एक दूसरे से जोड़ना और यह कोई साधारण काम नहीं थी।
इमाम ख़ुमैनी ने इस्लामी विचारधारा के प्रचार व पुनर्जीवन के लिए पैग़म्बरे इस्लाम व उनके पवित्र परिजनों के चरित्र को अपना मार्गदर्शक बना रखा था। उन्होंने इस्लामी आंदोलन के आरंभ से ही इस्लामी शिक्षाओं तथा पैग़म्बर व उनके परिजनों की परंपराओं पर भरोसा करके एक बार फिर, धर्म को समाज तथा राजनीति के क्षेत्र में प्रवेश दिलाने में सफलता प्राप्त की और काफ़ी समय बाद उसे लोगों के विचारों व जीवन में पुनर्जीवित किया। वे इस्लामी सरकार के गठन पर बल देते थे और इस संबंध में यह तर्क प्रस्तुत करते थे कि स्वयं पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम भी इस्लामी सरकार के गठन के बाद ही न्याय स्थापित कर पाए थे।
इमाम ख़ुमैनी ने अपनी वसीयत के एक भाग में लिखा है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने अपनी पूरी आयु इस्लामी राजनीति और इस्लामी सरकार के गठन के लिए बिता दी। इस्लाम की बहुत सी उपसनाएं, राजनैतिक आयाम लिए हुए हैं जिनकी ओर से निश्चेतना के कारण ही यह स्थिति उत्पन्न हुई है। पैग़म्बरे इस्लाम ने संसार की अन्य सरकारों की भांति ही सरकार गठित की किंतु सामाजिक न्याय के प्रसार की भावना के साथ, इस्लाम के आरंभिक ख़लीफ़ाओं की व्यापक सरकारें थीं और हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने भी न्याय के प्रसार की भावना के साथ सत्ता संभाली और यह बात इतिहास में बहुत स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है।
अमरीका के प्रख्यात रणनीतिकार हेनरी किसिंजर ने स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी के बारे में कहा हैः आयतुल्लाह ख़ुमैनी ने पश्चिम को कार्यक्रम तैयार करने के गंभीर संकट में डाल दिया। उनके फ़ैसले इतनी तेज़ी से सामने आते थे कि राजनितिज्ञों व नीति निर्धारकों के पास सोचने समझने का समय ही नहीं होता था और कोई भी पहले से उनके फ़ैसलों के बारे में अनुमान नहीं लगा सकता था। वे संसार के जाने पहचाने मानकों से अलग हट कर बातें करते थे और उन्हें व्यवहारिक बनाते थे, मानो उन्हें किसी दूसरे स्थान से इसका आदेश दिया जाता था।
स्पेन की इस्लामी समाज फ़ेडरेशन के प्रमुख डॉक्टर फ़्रान्सिस्को स्कोड्रो बेदाता कहते हैं कि इस्लामी जगत में इमाम ख़ुमैनी के जीवनदायक चेहरे को छुपाना संभव नहीं है और वे वर्तमान सदी की सबसे महान हस्तियों में से एक हैं। इमाम ख़ुमैनी के नेतृत्व में ईरान की इस्लामी क्रांति, इस्लामी जगत में अनेक बड़े परिवर्तनों का कारण बनी और उन्होंने इस्लाम का एक नया चेहरा संसार के सामने पेश किया। ईरान की इस्लामी क्रांति ने अन्याय के ख़िलाफ़ संघर्ष और तानाशाही व अमानवीय शासनों से मुक़ाबले का पाठ दिया। इमाम ख़ुमैनी ने ईरान में शाह की शक्तिशाली सरकार से संघर्ष में ईमान और अनन्य ईश्वर पर भरोसे के हथियार के माध्यम से इस्लामी क्रांति को विजयी बनाया। उनका जीवन सभी मुसलमानों के लिए एक उचित आदर्श है।